शुरु हो गया आज से महायुद्ध....
अफसोस कि इसमें किसी की जान नहीं जाएगी...
अफसोस कि इसमें सरकार की किरकिरी नहीं होगी...
ये अफसोस जनता नहीं करेगी...
ये अफसोस देश की सरकार भी नहीं करेगी...
क्योंकि सरोकार न सरकार को होगा...
न ही जनता को होगा...
सरोकार होगा संगीत के ठेकेदारों का...
हां... सीधे पिसेगी जनता भी और सरकार भी...
क्योंकि मिसाइलें बॉर्डर पर नहीं चल रही..
बल्कि घरों में चलेंगी..
धुनों की मिसाइलें...
सुरों की मिसाइलें...
बनाना जो है शहंशाह...
ढुंढना जो है मोती...
इस भीड़ के समंदर से ...
लेकिन रेत के नीचे दबेंगी...
कई जिंदगियां... कई उम्मीदें...
दिखानी है फिर किसी की बादशाहत...
करना है फिर किसी को उम्मीदों की कश्ती पर सवार....
करनी हैं लोगों की जेबे ढीलीं...
खेलना है उनके आंसुओं से...
और ढकेलना है सरकार को भी...
आखिर प्रतिभा का सवाल है....
आखिर जिम्मेदारी का सवाल है...
बजेंगे ढोल-नगारे...
दबेंगी उम्मीदें भविष्य बनाने की...
दबेंगी उम्मीदें अपने पैरों पर खड़े होने की...
दबेगा सच....
दबेगी रियलिटी...
क्योंकि यही रियलिटी का सच है...
यही बुद्धु बक्से की हकीकत है...
Friday, May 4, 2007
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1 comment:
दिखानी है लोगों को हसरत अपनी....
जाना भी है चांद के पार...
पर मुश्किल इतनी है...
कि आसमान बुला रहा है...
और जमीन वाले रास्ता रोक रहे हैं..
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