जी हां, हुजूर....
शादी के लड्डू खाना तो दूर की बात हो चुकी है, अब तो मौसम शादी के बाद के लड्डू खाने का है...
हम बात कर रहे हैं मीडिया की असीम अनुकंपा से हुई ऐश-अभिषेक की बहुचर्चित और बहुप्रतीक्षित शादी के लड्डू की । जो न्योते नहीं गये... जिनको बुलाया नहीं गया..
या यूं कहें जिनकी हसरत पूरी ना हो सकी...
जिनके ख्वाब बिखर गये... अब चर्चा में वे हैं...
कहते तो हैं कि बात उन्हीं की होती है जो या तो विख्यात हों या कुख्यात...
सो वे विख्यात जो शादी में शरीक हो गये... जिन पर कसीदे गढ़े गये..
अब गुजरे जमाने की बात हो चुके हैं....
अब उनसे कहीं आगे...
और अमर की अमरता से चर्चा कुख्यातों की होने लगी है..
लड्डू तो भेजे गए हैं कई घरों में....
कुछ ने स्वीकारी...
कुछ ने नकारी...
कुछ ने नाराजगी सरेआम की...
तो कुछ ने हाथ जोड़कर ही सलाम कहा...
फिलहाल शुरुआत शत्रु से ....
यूपी की चुनावी रंजिश ने शत्रु की अमित जी से शत्रुता बरकरार रखी और नतीजा मिठाई की वापसी तक पहुंच गया... यही नहीं शत्रुघ्न सिन्हा ने सरेआम अमर को मिसगाइडेड मिसाइल बताया और नतीजा यह हुआ कि मिसाइल फिर फायर हो गया और इस बार निशाना शत्रु ही बने... अमर ने उन्हें 'बेगानी शादी में शत्रु दीवाना' कहा...
दिलीप साब ने हाथ जोड़कर धन्यवाद कह दिया.... शक्ति की खटास मिटी नहीं और दिलीप कुमार ने सुपरस्टार की मिठाई को दूर से ही सलाम कहा....
वहीं बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना ने मिठाई को सहर्ष स्वीकार किया...
सो गुजरे जमाने के तीन सुपरस्टारों की भिड़ंत हो ही गई....
लेकिन अफसोस कि ये भी नागवार गुजरी...
बहरहाल, शादी के विशाल और 'भव्य' आयोजन के बाद अब नंबर मिठाईयों का ही है...
सो इंतजार कीजिए.. अगली रंजिश और मुठभेड़ का...
Sunday, May 6, 2007
Friday, May 4, 2007
रियलिटी का सच
शुरु हो गया आज से महायुद्ध....
अफसोस कि इसमें किसी की जान नहीं जाएगी...
अफसोस कि इसमें सरकार की किरकिरी नहीं होगी...
ये अफसोस जनता नहीं करेगी...
ये अफसोस देश की सरकार भी नहीं करेगी...
क्योंकि सरोकार न सरकार को होगा...
न ही जनता को होगा...
सरोकार होगा संगीत के ठेकेदारों का...
हां... सीधे पिसेगी जनता भी और सरकार भी...
क्योंकि मिसाइलें बॉर्डर पर नहीं चल रही..
बल्कि घरों में चलेंगी..
धुनों की मिसाइलें...
सुरों की मिसाइलें...
बनाना जो है शहंशाह...
ढुंढना जो है मोती...
इस भीड़ के समंदर से ...
लेकिन रेत के नीचे दबेंगी...
कई जिंदगियां... कई उम्मीदें...
दिखानी है फिर किसी की बादशाहत...
करना है फिर किसी को उम्मीदों की कश्ती पर सवार....
करनी हैं लोगों की जेबे ढीलीं...
खेलना है उनके आंसुओं से...
और ढकेलना है सरकार को भी...
आखिर प्रतिभा का सवाल है....
आखिर जिम्मेदारी का सवाल है...
बजेंगे ढोल-नगारे...
दबेंगी उम्मीदें भविष्य बनाने की...
दबेंगी उम्मीदें अपने पैरों पर खड़े होने की...
दबेगा सच....
दबेगी रियलिटी...
क्योंकि यही रियलिटी का सच है...
यही बुद्धु बक्से की हकीकत है...
अफसोस कि इसमें किसी की जान नहीं जाएगी...
अफसोस कि इसमें सरकार की किरकिरी नहीं होगी...
ये अफसोस जनता नहीं करेगी...
ये अफसोस देश की सरकार भी नहीं करेगी...
क्योंकि सरोकार न सरकार को होगा...
न ही जनता को होगा...
सरोकार होगा संगीत के ठेकेदारों का...
हां... सीधे पिसेगी जनता भी और सरकार भी...
क्योंकि मिसाइलें बॉर्डर पर नहीं चल रही..
बल्कि घरों में चलेंगी..
धुनों की मिसाइलें...
सुरों की मिसाइलें...
बनाना जो है शहंशाह...
ढुंढना जो है मोती...
इस भीड़ के समंदर से ...
लेकिन रेत के नीचे दबेंगी...
कई जिंदगियां... कई उम्मीदें...
दिखानी है फिर किसी की बादशाहत...
करना है फिर किसी को उम्मीदों की कश्ती पर सवार....
करनी हैं लोगों की जेबे ढीलीं...
खेलना है उनके आंसुओं से...
और ढकेलना है सरकार को भी...
आखिर प्रतिभा का सवाल है....
आखिर जिम्मेदारी का सवाल है...
बजेंगे ढोल-नगारे...
दबेंगी उम्मीदें भविष्य बनाने की...
दबेंगी उम्मीदें अपने पैरों पर खड़े होने की...
दबेगा सच....
दबेगी रियलिटी...
क्योंकि यही रियलिटी का सच है...
यही बुद्धु बक्से की हकीकत है...
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