Sunday, April 29, 2007

सच.. यही आखिरी नहीं

चंद सच्चाईयां... जिनसे हम भागते हैं....
चंद फसाने... जिसके पीछे हम भागते हैं...
बच हम उन सच्चाईयों से भी नहीं पाते...
पकड़ हम उन फसानों को भी नहीं पाते...
तो रहते हैं कहां !!!!
सच और फसानों की पगडंडी के बीच...
लेकिन कभी-कभी ये भी पतली होती जाती है और तब...
आसरा होता है केवल उस रास्ते का जिसपे सच भी होता है...
और फसाना भी...

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